संदेश

माँ तेरे चेहरे की झुर्रियों में

माँ तेरे चेहरे की झुर्रियों में,मेरी उम्र नजर आती हैं। हँसती मुस्कुराती हैं तो,मेरी रूह नजर आती हैं।। खो दिया है ख़ुद को, मुझे सभ्य बनाने में, फिर भी तुझसा कोई नहीं, खूबसूरत इस जमाने में। तेरे प्यार की गहराई, मिलती न कहीं दिल लगाने में, सच तू है अहसास तू हैं, वात्सल्य के सिरहाने में। माँ तेरी आँखों के सपनें, जलते देखें तहखाने में, पूरी ज़िंदगी बिता दी तूने, अपना घर संवारने में। तुझे कभी न रोते देखा, किस्मत के दरवाजे में, तुझमें पावन धाम मिलता, चरणों में शीश झुकाने में।। कवि लिकेश ठाकुर

एक आँसू बोल पड़ा

एक आँसू बोल पड़ा,उठ जा अब हो खड़ा, अब वक्त कुछ करने का,जख्मों को तू कर हरा। पाले जो सपनें आँखो में,चीर पहाड़ों का सीना। डगमगा जाए तेरे कदम,मन में भर ले हौसला। एक आँसू बोल पड़ा,नीदों को तूने पछाड़ दिया। कुछ दिन की तो बात हैं,दिल में विश्वास भर जरा। क्यों तन दर्द से कराह रहा,क्यों तू मौहलत मांग रहा। उठ खुद हुंकार भर,लेके ज्ञान का तू भाला। मौत भी ये देख हारेगी,तेरे अंदर का ये जज़्बा। सुकून भरी निग़ाहों से,देखेंगी जब ये जनता। क्या दर्द ,सर्द की पीड़ा में,तू राहों में खड़ा रहा। एक आँसू बोल पड़ा,उठ जा अब हो खड़ा। अब वक्त कुछ करने का,जख्मों को तू कर हरा।।

पतंग

पतंग पहले उठती गिरती संभलती, कई रंगों में सजी पतंग, इठलाती थोड़ा शर्माती, आसमान में उड़ती पतंग। गैरों से मिले सोच कभी, आपस में गले लगाती पतंग, मतभेद और मनभेद हो तो कभी आपस में लड़ जाती पतंग। क्रोध भाव अविचल विरासत, भूल गमों और मुस्कुराती पतंग। रंग बिरंगे कपड़े पहन, मस्त गगन में इठलाती पतंग। हवा से कर दोस्ती का वादा, आँधियों से लड़ती पाती पतंग। हार जाये कभी संघर्ष तो, हवाओ के संग उड़ जाती पतंग। कभी सोचती सूरज को छू लू, लहरों से टकराती पतंग। हौसला लिये तीर्व बाजुओं में, इंसानों की सुनती पतंग। मैं तो इक कठपुतली सी हूँ, मर्जी से न उड़ती पतंग। लालच मुझमें आ ही जाता, देखू जब मुझसे बड़ी पतंग। जंजीर तोड़ भागने का मन करता, बिन मांझे मैं नहीं पतंग। सर्द हवाओं के मौसम में, ठिठुराती मुझको ये पवन, धीरे-धीरे बादलों को छूती, माँझे में फसी इक़ पतंग। बच्चों बूढों की मैं खुशी, तरुणों की मैं तरुणाई पतंग। मैं तो ईशारों में उड़ती, आसमान में होके मगन, मुझमें कुछ सीख समाएँ, ख्वाहिश को जीती पतंग।। पहले उठती गिरती संभलती, कई रंगों में सजी पतंग, इठलाती थोड़ा शर्माती, आसमान में उड़ती पतंग।। रचनाकार ✍️लिकेश ठाकुर

इन जूतों ने बहुत सहा हैं

इन जूतों ने बहुत सहा हैं, रास्तों का अपमान भी, लगे पत्थर ठोकरें जब, टूटे बहुत अरमान भी। चलना निःसन्देह पथ पर, जुदा हो अगर ख़्वाब भी, पलकों ने झुकके देखा होगा, परतों के गहरे घाव भी। इन जूतों ने बहुत सहा हैं, रास्तों के अपमान भी। सही दिशा में चल पड़ा, राही का अभिमान भी, रूक गया यदि राहों पर, होगा मेरा उपहास भी। सुना हैं चमकते जूतों पर, मोतियों का साथ भी, जड़ जाएँ मनका इस पर, लाखों में खास भी। रंग बिरंगा मेरे साया, सबका मिले प्यार भी, फट जाऊं आधे पथ पर, सड़क किनारे उतार दी। मैं झुलसा खुद से खुद, वार्डरोब की आग भी, जिसके पग में चढ़ जाऊं, अनंत मिले सम्मान भी। इन जूतों ने बहुत सहा हैं, रास्तों का अपमान भी। खुली निगाहें मुझ पर टिकी, पृष्ठभूमि ना नाम भी, जिसके सिर पड़ जाऊं, मृत्यु से बड़ा अपमान भी। मैं कवच हूँ पैरों का, काँटे न चुभे कंकाल भी, इन जूतों ने बहुत सहा हैं, रास्तों का अपमान भी।। @कवि लिकेश ठाकुर

मैं हूँ फूल बग़ीचे का

मैं हूँ फूल बगीचे का मैं हूँ फूल बगीचे का,, मेरी महक सबकों भाएँ, मेरा खिलना सबकों सुहाएं, मैं अर्द्ध पूरा थोड़ा खिला सा, भोरें तितली के मन को भाएँ। मैं हूँ फूल बग़ीचे का,, खुशबू से मनमुग्ध घटाएँ, बगीचे में प्यारी जनता आएँ, कली कोमल जो टूट जाएँ, मेरी पीड़ा कोई समझ न पाएं। मैं हूँ फूल बगीचे का,, जीवन मुझसे सीख जरा तू, इक पल जीके मैं झड़ा हूँ, मेरे आगोश में बैठे जोड़ो को, कोई अपना सा मैं लगा हूँ, गिरता,खिलता हो जाएँ सवेरा, नये कोपल में ढलें शरीर मेरा, मैं हूँ फूल बगीचे का ,, रोज मद्धम समीर की छुवन, मुझे मदहोश करती हैं, मैं भी इक अहसास जमीं पर, इत्र बन उसे मदहोश करता हूँ। मुझ कों धूल गले लगाएँ, आकर मुझसे लिपट जाएँ। वीर हो या प्रभु हमारे, उनके शीश पर मैं इठलाऊँ। मैं हूँ फूल बगीचे का,, ना ख़लिश न शिकायत, काटे मुझे हर पल बचाएँ। तोड़ मरोड़ के माली मुझकों, माला सी कर उन्हें पहनाएं। नारी के केशों की हूँ शोभा, मैं गिरूं वहाँ पर हमेशा, जिस पथ वीर अनेकों जाएँ। मैं हूँ फूल बग़ीचे का।। कवि लिकेश ठाकुर

मेरे पापा

मेरे पापा मुझे आसमान में उड़ना हैं, हवाई जहाज ला दो पापा, मुझे चाँद को पकड़ना हैं, थोड़ा ऊँचा उठा दो पापा। मुझे घोड़े पर बैठना हैं, घोड़ा बन जाओ मेरे पापा। मुझे खिलौने ख़रीदना हैं, गाड़ी से घुमा दो पापा। मुझे बुखार हो रहा हैं, हॉस्पिटल ले चलो पापा। मुझे बहुत दर्द हो रहा हैं, पैर सर दबा दो मेरे पापा। मुझे अच्छे कॉलेज में पढ़ना हैं, फीस जमा कर दो पापा। अपनी इक्छा को दबा कर, नई गाड़ी दिला दो पापा। बनूगा बुढ़ापे का सहारा, विश्वास करो मेरे पापा। अब बड़ा हो गया हूँ, दुल्हन दिला दो मेरे पापा। आँसूओ को क्यों छुपा लिया, थोड़ा आँसू बहा दो पापा। जोड़े तुमने पैसे पाई-पाई, खुशियों में उड़ा दिया मेरे पापा। याद हैं बचपन की रातें, अपनी नींद उड़ायी मेरे पापा। खुद सोते गीले बिस्तर पर, मुझे पर रज़ाई उड़ाई मेरे पापा। कितना तुमने त्याग किया हैं, कैसे ऋण चुकाऊँ मेरे पापा।। कवि लिकेश ठाकुर

दर्द सबकों होता हैं

दर्द सबकों होता हैं कोई यहाँ सुकून के आँसू बहाता हैं, तो कोई यहाँ गम में चूर हो जाता हैं। मिलते ही पराये यहाँ अपना हो जाता हैं, कोई नम आँखों से झूठा मुस्कुराता हैं। अंजान बनते यहाँ दर्द सबकों होता हैं। कोई ज़ख्म छुपाता मरहम कोई लगाता हैं, मिलते ही साथ किसी का वक़्त कट जाता हैं। हवाओं सी किसी की राहें जुदा हैं, किसी को मानता कोई शख्स ख़ुदा हैं। झुठी आस कहीं मिलती दिलासा हैं, उड़ते पँछी से सपनों की आशा हैं। कितना भी कोई क्यों न छुपाता हैं, इंसान सभी यहाँ दर्द सबकों होता हैं। likesh thakur