आ ओ बदरा प्यारे

नयन अब तरस गये,
जून आग सुलगाये,
गर्मी के जुल्मों के साये,
बादल अब गड़गड़ाये।
रुक न हिमालय की चोटी पर,
आ ओ बदरा प्यारे।

इठला उठी हिरनी की टोली,
पँछी घोंसला बनाये,
जल्द आना आहिस्ता आना,
ताकि घर उजड़ ना जाये।
फसलों के उपजने का मौसम,
बादल अब तो दरस दिखाये।
ताके रास्ता किसान खेत पर,
आ ओ बदरा प्यारे।

नदी सरोवर की प्यास में,
बरसों बदरा भू तृप्त हो जाये।
जमीं के सूखे ट्यूबवेल की,
उम्र सारी तुम्हें लग जाये।
प्रतीक्षा करते थक ना जाये,
आ ओ बदरा प्यारे।
आ ओ बदरा प्यारे।।
             @लिकेश ठाकुर



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